कृष्ण ने तोड़ा सत्यभामा का अहंकार | श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2025”
सत्यभामा ने किया श्री कृष्ण का दान | कृष्ण ने तोड़ा सत्यभामा का अहंकार | श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2025
Krishna janmashtmi 2025 : भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल एक देवता का जीवन नहीं है, बल्कि यह धर्म, नीति, भक्ति और प्रेम का अद्वितीय संगम है। उनके हर एक लीला प्रसंग में मानव जीवन के लिए गहन संदेश छिपा हुआ है।
इन्हीं लीलाओं में एक महत्वपूर्ण कथा है – सत्यभामा द्वारा श्रीकृष्ण का दान और उनके अहंकार का हरण। यह कथा हमें यह सिखाती है कि भगवान को किसी भी वस्तु या अहंकार से नहीं, बल्कि केवल निष्काम भक्ति और प्रेम से ही पाया जा सकता है।
आज जब हम श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025 (Krishna janmashtmi 2025) का पावन पर्व मना रहे हैं, तो यह कथा हमें और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है।
सत्यभामा कौन थीं?
सत्यभामा, भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय पटरानी थीं। वे अत्यंत रूपवान, साहसी और कभी-कभी अहंकार से युक्त भी मानी जाती थीं। सत्यभामा अपने सौंदर्य और वैभव पर गर्व करती थीं और मानती थीं कि उनके पास जो धन-संपत्ति है, उसके बल पर वे सब कुछ कर सकती हैं।
लेकिन श्रीकृष्ण ने एक विशेष प्रसंग में उनके इस अहंकार को तोड़ा और उन्हें यह समझाया कि भक्ति का मूल्य सोने-चांदी से कहीं अधिक है।
सत्यभामा के क्यों किया कृष्ण का दान कथा
कथा के अनुसार, एक बार नारद मुनि द्वारका पहुँचे। नारद जी अपनी माया और लीलाओं के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने सत्यभामा से कहा “मातेश्वरी! आप तो समस्त ऐश्वर्य की स्वामिनी हैं, क्यों न आप भगवान श्रीकृष्ण को तुला (तराजू) पर बैठाकर अपने धन-संपत्ति से उनका मूल्य चुकाएँ और उन्हें अपने आधिपत्य में सिद्ध कर लें।”
सत्यभामा के मन में अहंकार जागा। उन्हें लगा कि उनके पास इतना सोना-चाँदी और रत्न हैं कि वे आसानी से भगवान श्रीकृष्ण को तुला पर तोल सकती हैं।
श्रीकृष्ण को तुला पर बैठाना
सत्यभामा ने तुरंत आदेश दिया और एक विशाल तुला मंगवाई। श्रीकृष्ण हँसते हुए स्वयं तुला पर बैठ गए।अब सत्यभामा ने अपनी अपार संपत्ति तुला पर रखनी शुरू की – सोना, चाँदी, हीरे, मोती, रत्न, बहुमूल्य वस्तुएँ – सब कुछ रखा लेकिन आश्चर्य!भगवान श्रीकृष्ण का भार तुला के एक पलड़े में स्थिर ही रहा, जबकि दूसरे पलड़े पर रखा अपार धन भी उन्हें संतुलित नहीं कर पाया।
सत्यभामा के मन का अहंकार टूटने लगा। वे परेशान हो गईं कि आखिर उनके समस्त वैभव का मूल्य भगवान के आगे कुछ भी क्यों नहीं है।
रुक्मिणी का प्रवेश
जब सत्यभामा निराश हो गईं, तब भगवान की पतिव्रता रानी रुक्मिणी वहाँ आईं। उन्होंने बड़ी सरलता से तुला पर केवल एक तुलसी का पत्र रखा और मन-ही-मन भगवान से प्रार्थना की –
“प्रभु! यह तुलसी पत्र मेरे प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। इसे स्वीकार करें।”ज्यों ही तुलसी पत्र तुला पर रखा गया, उसी क्षण तुला संतुलित हो गई।समस्त सोना-चाँदी और रत्नों का भार भगवान के तुल्य नहीं हो पाया, लेकिन एक सच्ची भक्ति से अर्पित तुलसी पत्र ने भगवान को प्रसन्न कर तुला को संतुलित कर दिया।
सत्यभामा का अहंकार भंग
यह दृश्य देखकर सत्यभामा के नेत्रों में आँसू आ गए। उन्हें समझ में आया कि भगवान को धन-दौलत या अहंकार से नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम और भक्ति से ही जीता जा सकता है।
सत्यभामा ने भगवान से क्षमा माँगी और अपने अहंकार का त्याग किया।
इस कथा से शिक्षा
1. चाहे हमारे पास कितना भी वैभव क्यों न हो, भगवान के सामने वह तुच्छ है।
2. भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग प्रेम और भक्ति है।
3. हिंदू धर्म में तुलसी को देवी स्वरूप माना गया है। यह कथा बताती है कि तुलसी पत्र का मूल्य सम्पूर्ण धन से अधिक है।
4. ईश्वर भक्ति में भावनाओं का महत्व है, बाहरी प्रदर्शन का नहीं।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025 और यह कथा
हर साल हम जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को याद करते हैं।
जन्माष्टमी 2025 में जब हम यह कथा सुनते और स्मरण करते हैं, तो हमें यह प्रेरणा मिलती है कि –
हमें अपने जीवन से अहंकार, दिखावा और भौतिक मोह को दूर करना चाहिए।
भगवान केवल उस हृदय में वास करते हैं, जो शुद्ध, सरल और प्रेममय है।
यदि हम चाहें तो एक तुलसी पत्र या एक बूँद प्रेम से भी प्रभु को पा सकते हैं।
कथा का गूढ़ अर्थ
सत्यभामा का अहंकार मानव स्वभाव का प्रतीक है। जब इंसान को धन और वैभव मिलता है, तो उसमें यह भ्रम आ जाता है कि सब कुछ उसी के अधीन है।लेकिन यह कथा बताती है कि –सच्चे सुख का स्रोत धन नहीं, बल्कि ईश्वर की भक्ति है।भगवान को केवल शुद्ध मन, निःस्वार्थ प्रेम और सच्ची श्रद्धा से ही पाया जा सकता है।
आधुनिक जीवन में कथा का संदेश
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में हम अक्सर धन, पद और प्रतिष्ठा को ही सब कुछ मान बैठते हैं। लेकिन यह कथा हमें याद दिलाती है कि –अहंकार का अंत निश्चित है।भक्ति और प्रेम ही जीवन की वास्तविक पूँजी हैं।जब तक हम भगवान को हृदय से नहीं पुकारेंगे, तब तक कोई भी पूजा-पाठ, यज्ञ या दान पूर्ण नहीं हो सकता।
सत्यभामा और श्रीकृष्ण की यह कथा हमें जीवन का गहन सत्य बताती है।धन-संपत्ति और अहंकार भगवान को नहीं बाँध सकते, लेकिन सच्चा प्रेम और भक्ति भगवान को भी तुला पर झुका सकते हैं।इसलिए इस श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025 पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि –
- हम अपने जीवन से अहंकार को दूर करेंगे।
- हम ईश्वर की भक्ति और सेवा में तन-मन लगाएंगे।
- और हर दिन एक तुलसी पत्र की तरह अपने हृदय की सरलता भगवान को अर्पित करेंगे।
- यह कथा न केवल जन्माष्टमी पर्व की महिमा बढ़ाती है, बल्कि हमारे जीवन को भी भक्ति और प्रेम से आलोकित करती है


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