Tulsi Vivah Pauranik Katha | तुलसी विवाह पौराणिक कथा | भगवान विष्णु और देवी तुलसी का दिव्य विवाह

 तुलसी विवाह पौराणिक कथा .Tulsi Vivah Pauranik Katha

Tulsi Vivah Pauranik Katha . तुलसी विवाह पौराणिक कथा


Tulsi Vivah : देवउठनी एकादशी के अगले दिन, यानी 2 नवंबर (रविवार) को तुलसी विवाह कराया जाएगा. हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है. मान्यता  है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के योगनिद्रा (चातुर्मास) के बाद जागते हैं, और विष्णु का विवाह तुलसी देवी (वृंदा) के साथ कराया जाता है. तुलसी विवाह को कार्तिक मास की सबसे शुभ तिथियों में से एक माना जाता है. इस दिन तुलसी और शालिग्राम (भगवान विष्णु का स्वरूप) का विवाह विधि-विधान से कराया जाता है. 

ऐसा विश्वास है कि तुलसी विवाह से जीवन में वैवाहिक सुख, संतुलन, सफलता और शांति बनी रहती है. इस दिन से हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों के शुभ  कार्यों की शुरुआत भी होती है. देवउठनी एकादशी तक विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, लेकिन तुलसी विवाह के बाद इन सभी कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त शुरू हो जाते हैं. 

हर साल देव उठनी एकादशी के दिन, जब भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं, तब तुलसी विवाह का पवित्र पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु का विवाह माता तुलसी (वृंदा) से शालिग्राम रूप में किया जाता है। यह विवाह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सतीत्व, भक्ति और प्रेम का प्रतीक भी है।

एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।

दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया। वहाँ से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया।

भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु माँ ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहाँ से अंतर्ध्यान हो गईं। देवी पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत आवश्यक था।

Tulsi Vivah Pauranik Katha . तुलसी विवाह पौराणिक कथा
Tulsi Vivah Pauranik Katha . तुलसी विवाह पौराणिक कथा

इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वन में जा पहुँचे, जहाँ वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा। 

ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्छित हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।

भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल का तनिक भी आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।

इस सारी लीला का जब वृंदा को पता चला, तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को ह्रदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया। अपने भक्त के श्राप को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गये। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रम्हांड में असंतुलन की स्थिति हो गई। यह देखकर सभी देवी देवताओ ने वृंदा से प्रार्थना की वह भगवान् विष्णु को श्राप मुक्त कर दे।

वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर स्वयं आत्मदाह कर लिया। जहाँ वृंदा भस्म हुईं, वहाँ तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा: हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक महीने के देव-उठावनी एकादशी का दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।

उसी दैत्य जालंधर की यह भूमि जलंधर नाम से विख्यात है। सती वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। कहते हैं कि इस स्थान पर एक प्राचीन गुफा भी थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।जिस घर में तुलसी होती हैं, वहाँ यम के दूत भी असमय नहीं जा सकते। मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी व आंवलों की छाया में अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।

तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व

तब से हर वर्ष कार्तिक मास की देव उठनी एकादशी को तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाता है।इस दिन तुलसी और शालिग्राम या भगवान विष्णु की प्रतिमा का विवाह कर धार्मिक पुण्य, वैवाहिक सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

तुलसी का घर में होना शुभ क्यों माना जाता है

जिस घर में तुलसी का पौधा होता है, वहाँ यमदूत प्रवेश नहीं कर सकते। मृत्यु के समय यदि व्यक्ति के मुख में तुलसी पत्ती और गंगाजल रखा जाए, तो वह वैकुंठ धाम प्राप्त करता है। तुलसी और आंवला के पेड़ के नीचे पितरों का श्राद्ध करने से उनके पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

Tulsi Vivah Pauranik Katha 

वृंदा देवी मंदिर, जालंधर

  • कहते हैं, जालंधर नगर का नाम दैत्यराज जालंधर के नाम पर पड़ा।
  • वृंदा देवी का मंदिर आज भी जालंधर के कोट किशनचंद मोहल्ले में स्थित है।
  • यहाँ श्रद्धापूर्वक 40 दिन पूजा करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • प्राचीन कथाओं के अनुसार, इस मंदिर के नीचे एक गुफा थी जो सीधे हरिद्वार तक जाती थी।

FAQ 

Q. तुलसी विवाह कब मनाया जाता है?

Ans. हर साल कार्तिक मास की देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह मनाया जाता है।

Q2. तुलसी विवाह में क्या चढ़ाया जाता है?

Ans. तुलसी माता को लाल चुनरी, सुहाग सामग्री, दीपक, शक्कर, कपूर और भगवान विष्णु के साथ शालिग्राम रूप में विवाह किया जाता है।

Q3. तुलसी विवाह का क्या लाभ होता है?

Ans. यह विवाह वैवाहिक सुख, समृद्धि, और मोक्ष प्रदान करता है। विवाहित दंपति को विशेष रूप से यह व्रत करना चाहिए।

Q4. क्या तुलसी विवाह केवल महिलाएँ कर सकती हैं?

Ans. नहीं, पुरुष और महिलाएँ दोनों तुलसी विवाह कर सकते हैं। यह पारिवारिक कल्याण और धर्म वृद्धि का प्रतीक है।

Q5. क्या तुलसी विवाह घर में किया जा सकता है?

Ans. हाँ, तुलसी विवाह घर पर भी पूर्ण विधि से किया जा सकता है। तुलसी चौरा पर मंडप सजाकर भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से विवाह करें।


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