सोमवार व्रत: क्यों, कब और कैसे करें? सोमवार व्रत कथा | Somvar Vrat Katha aur Kahani,
सोमवर व्रत क्यों रखा जाता है?
- सोमवार व्रत के माध्यम से शिव जी की भक्ति प्रदर्शित की जाती है।
- व्रत रखने से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
- जिन्हें अपनी मनोकामना पूरी करनी होती है, वे सोमवार व्रत या कोई भी अन्य व्रत को करते हैं।
- सोमवार व्रत से स्वास्थ्य लाभ भी माना जाता है।
- सोमवार के दिन शिव परिवार की यानी भगवान शिव, माता पार्वती और उनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय की पूजा की जाती है।
सोमवार व्रत कब करें?
श्रावण मास के सोमवार: यह मास शिवजी को समर्पित होता है। इस मास में जो सोमवार आता है, उसका व्रत रखना अत्यंत शुभ माना जाता है।
शिवरात्रि: यह शिव जी का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन उपवास और पूजा का विशेष महत्व होता है।
ज्योतिष अनुसार: यदि किसी की कुंडली में शनिदोष या अन्य ग्रह दोष हैं, तो सोमवार व्रत करना शुभ रहता है।
सोमवार व्रत कैसे करें?
सोमवार व्रत सरल और प्रभावशाली होता है, जिसका पालन पूरी श्रद्धा और नियम के साथ किया जाना चाहिए। नीचे सोमवार व्रत की विधि और नियम विस्तार से दिए गए हैं।
व्रत की तैयारी
कोई भी व्रत से पहले शरीर और मन को शुद्ध करें। स्नान करें, साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। यही कार्य सोमवार व्रत में भी करना होता है पूजा के लिए स्वच्छ और शांत स्थान चुनें। शिव जी की प्रिय भोग संगरिया जैसे बेलपत्र, धूप, दीपक, जल, फल, मिठाई, फलाहार सामग्री आदि इकट्ठा करें। व्रत का दिन (सोमवार) सुबह जल्दी उठें: 4:00 से 6:00 बजे के बीच उठना शुभ होता है। स्नान करें: गंगा जल या किसी पवित्र जल से स्नान करें।
सावधानी: किसी भी व्रत के दिन मांसाहार, मदिरा, और आलस्य से बचें। सात्विक भोजन करे ब्रमचाय का पालन करे
कोशिश करे की निर्जल (जल) या फलाहार का सेवन करें, कुछ लोग संपूर्ण निर्जल व्रत भी करते हैं।किसी स्वास्त्य समय से परेशां है तो आप अन्न ,जल ले सकते है
सोमवार पूजा विधि
शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर के सामने दीपक जलाएं। शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल चढ़ाएं। बेलपत्र और अन्य पवित्र फूल चढ़ाएं।ॐ नमः शिवाय" का जाप करें। कम से कम 108 बार जपना शुभ होता है। शिवजी की आरती करें और प्रसाद अर्पित करें।
व्रत का संधि : अगर संभव हो तो शिवरात्रि की तरह सोमवार व्रत में भी रात्रि जागरण करें, शिवजी की कथाएं सुनें या पढ़ें। रात में या अगले दिन सुबह दूध चढ़ाने से व्रत पूर्ण माना जाता है। व्रत के बाद प्रसाद परिवार और जरूरतमंदों में बांटें।
सोमवार व्रत के नियम और उपाय
- व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म शुद्ध रखें।
- व्रत के दिन सच बोलना आवश्यक है।
- क्रोध त्यागें, शांति बनाए रखें।
- शिव पुराण, भागवत आदि का पाठ करें।
- जरूरतमंदों को दान देना शुभ फलदायक होता है।
- यदि संभव हो तो गुरु या संत से आशीर्वाद लें।
सोमवार व्रत के लाभ
सोमवार व्रत से अनेक लाभ होते हैं, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर महसूस किए जा सकते हैं।जीवन के कष्ट और दुख दूर होते हैं। शरीर स्वस्थ रहता है, रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है।व्रत से परिवार में प्रेम और सद्भाव बढ़ता है।
- विवाहित जोड़ों को संतान सुख मिलता है।व्यवसाय और धन लाभ में वृद्धि होती है।
- मन में संतोष और आंतरिक शांति का अनुभव होता है।
- सोमवार व्रत के दौरान खाने-पीने की शर्ते
- कई लोग केवल जल या फलाहार करते हैं।
दूध, दही, शहद का सेवन करना चाहे तो पूजा के बाद ही करे है। अगर आप संपूर्ण निर्जल व्रत रखते हैं तो भोजन नहीं करना चाहिए। तो ऐसा भी कर सकते या आप फलाहार कर सकते है
हमारे हिंदू परंपरा या पुराणों में कहा गया है की व्रती को व्रत के दिन ताजा, हल्का और शुद्ध भोजन लेना चाहिए।
एक बार किसी एक नगर में एक साहूकार था। उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन कोई संतान न होने के कारण वह बहुत दुखी था। संतान प्राप्ति के लिए वह हर सोमवार को व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करता था। उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न होकर भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। पार्वती जी के आग्रह पर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति देखकर उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन उन्होंने बताया कि यह बालक 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।
माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था, इसलिए उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय के बाद साहूकार की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया। साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन देते हुए कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ। तुम लोग रास्ते में यज्ञ कराते जाना और ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देते हुए जाना। दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी नगरी निकल पड़े। इस दौरान रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था, लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए सोचा क्यों न उसने साहूकार के पुत्र को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा। लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह करा दिया गया।
साहूकार का पुत्र ईमानदार था। उसे यह बात सही नहीं लगी इसलिए उसने अवसर पाकर राजकुमारी के दुपट्टे पर लिखा कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं।’ जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया फिर बारात वापस चली गई। दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन लड़का 12 साल का हुआ उस दिन भी यज्ञ का आयोजन था लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर आराम कर लो। शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए। मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप करना शुरू किया। संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे। पार्वती माता ने भोलेनाथ से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा, आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें।
जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था, अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। माता पार्वती के पुन: आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया। शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया। शिक्षा पूरी करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर वापस चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया।
इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है। इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।


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